रहते एक छत के नीचे , पर आपस में मिलते नहीं , कमरे में बस्ती अब दुनिया , एक दूजे के लिए वक़्त नहीं , साथ बैठे , खाते थे जो पहले , अब टीवी , फेसबुक से फुर्सत नहीं .. अब व्हाट्सएप्प का ज़माना है , ये बात करने , समझाने का ठिकाना है , झगड़ते थे कभी वक़्त नहीं मिलने पे जो , अब ' लास्ट सीन ' नया बहाना है , कभी जो मिलकर दिल करते थे हल्का , अब हाल - ए - दिल भी , स्टेटस पर होता जताना है .. ये अजब गज़ब सी दुनिया में , इंसानो से ज़्यादा मशीनों का ज़माना है , समझता यूँ तो हर कोई है फिर भी , न जाने नुक्सान से क्यों दिखता अंजाना है , हम जो कर बैठे दर्द - ए - दिल बयां उनको , लिखते 'टू लॉन्ग मैसेज टू रीड', यार 'शार्ट फॉर्म' का ज़माना है !
वो दौड़ता है रोज़ , मंज़िल की ओर , ढूंढने अपना रास्ता , फिर भीड़ में खोकर .. फिर होता है निराश , नाकामी पर अपनी , खोजता है खुदको , फिर भीड़ में खोकर .. उम्मीद फिर बनती है , सपने फिर सजते हैं , नयी राह पकड़ता है , फिर भीड़ में खोकर .. उलझनों के जाल में , भीड़ के जंजाल में , फंस गया है इंसान ऐसे , बंद पिंजरे में पंक्षी जैसे .. हर कोई आज .. इस दौड़ का हिस्सा है , कभी ना ख़त्म हो ... ये वो किस्सा है !
आज बात करने को जी चाहा , तो सोचा खुद से बतिया लिया जाये , मन जो भारी सा है , हल्का किया जाये , कभी रोई , कभी हंसी , पर बातें चलती रहीं , मन हल्का हुआ और शांत भी , फिर सोचा .. ये कोशिश अब अक्सर की जाये , आज वक़्त कहाँ है किसी के पास , खुद में दोस्त को तलाश लिया जाये , ये समझता भी है , समझाता भी , हर मुसीबत में साहस बढ़ाता भी , मासूम सा है और चंचल भी , मुझमें आत्मविश्वास जगाता भी , मुझ में ही तो है तू , पर दिखता नहीं सामने , आवाज़ देता है अंदर से , सोचा कुछ गुनगुना लिया जाये , ज़िन्दगी की भागती कश्मकश में , अब आसान लगता है जीना , दोस्त जो मिला खुद में ....... ‘ खुद को’ खुद में जी लिया जाये !
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