आज बात करने को जी चाहा , तो सोचा खुद से बतिया लिया जाये , मन जो भारी सा है , हल्का किया जाये , कभी रोई , कभी हंसी , पर बातें चलती रहीं , मन हल्का हुआ और शांत भी , फिर सोचा .. ये कोशिश अब अक्सर की जाये , आज वक़्त कहाँ है किसी के पास , खुद में दोस्त को तलाश लिया जाये , ये समझता भी है , समझाता भी , हर मुसीबत में साहस बढ़ाता भी , मासूम सा है और चंचल भी , मुझमें आत्मविश्वास जगाता भी , मुझ में ही तो है तू , पर दिखता नहीं सामने , आवाज़ देता है अंदर से , सोचा कुछ गुनगुना लिया जाये , ज़िन्दगी की भागती कश्मकश में , अब आसान लगता है जीना , दोस्त जो मिला खुद में ....... ‘ खुद को’ खुद में जी लिया जाये !
So Beautifully Written! Amazing work.
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