आज़ाद चिड़िया चली है दुसरे छोर, मन को चीरते सवाल है घनघोर, कहते हैं ढूँढा है उसने चितचोर, मगर दिल में उठ रहा क्यूँ शोर, चंचल नहीं फैसला था कठोर, उम्मीद है बाकी आएगी नई भोर, आज़ाद चिड़िया चली है दुसरे छोर |
सपनें दिखाकर , हाथ बढ़ाकर सेवा का , मौका माँगा था कुर्सी पर बैठे तो समझे वही वादे थे , जो जुमले हो गए सवाल पुछा , भक्त गुंडे हो गए माँगा हक़ , सब गुम हो गए कैसी व्यवस्था है , कैसा ये राज है छलावा है हर तरफ , ना शर्म ना लाज है , वो तो कहते थे अब हम स्वतंत्र हैं , गणतंत्र हैं नकाबपोशों का ये लोकतंत्र नहीं षड़यंत्र है
चाहने और पाने के दरमियां फ़ासला लम्बा है रास्ता है , मंज़िल भी , पर अनदेखी डोरियां हैं खींचती पीछे तुम्हें , ख्वाहिशों से हक़ीक़त के दरमियां फ़ासला लम्बा है यादें हैं बस दरमियां जो साथ हैं , हक़ीक़त की तरह उम्मीद है , ख्वाहिश की तरह ....
सवाल भी हैं , जवाब भी , हर बात का हिसाब भी , सुनाने को बहुत से किस्से , पर तू नहीं जो मेरे हिस्से , खामोश अब जज़्बात हैं , खुश्क से मिजाज़ हैं , गिला नहीं , शिक़वा भी नहीं , उम्मीद बाकी है मगर , मिलेंगे शब्द इन्हें भी , इक रोज़ कभी जब तुम पढोगे , दिल की बातें , दिल की ज़ुबानी
नाउम्मीदी से उम्मीद का , सफर बहुत लम्बा है... उलझा सा , कभी सुलझा भी , ख्वाब के पंख कभी बुनता भी , हो सकने से.... ना हो सकने का , सफर बहुत लम्बा है... ज़िन्दगी यूँ तो गुलज़ार है , ना किसी चीज़ की दरकार है , मुकम्मल होकर भी जो हो ना सके पूरा , सब पाने में ..पर भी... उस " काश" का , सफर बहुत लम्बा है...