ये कैसा राज, ये कैसी नीति ?
सपनें दिखाकर , हाथ बढ़ाकर सेवा का , मौका माँगा था कुर्सी पर बैठे तो समझे वही वादे थे , जो जुमले हो गए सवाल पुछा , भक्त गुंडे हो गए माँगा हक़ , सब गुम हो गए कैसी व्यवस्था है , कैसा ये राज है छलावा है हर तरफ , ना शर्म ना लाज है , वो तो कहते थे अब हम स्वतंत्र हैं , गणतंत्र हैं नकाबपोशों का ये लोकतंत्र नहीं षड़यंत्र है