लॉक डाउन में वर्क फ्रॉम होम शुरुआती समय में जन्नत सा लगता था। घर में आरामदायक सोफे पर पालती मारके, लैपटॉप सामने रख के, बगल में चाय का कप.... लेकिन सुर्खियां देखकर और न्यूज़ रूम की बहस सुनकर चाय का स्वाद अक्सर फ़ीका लगता था। ख़ैर... हमारे घर के सामने अजीब पड़ोसी आंटी रहती हैं। अजीब ... क्योंकि ना तो वो बात करती हैं, ना बाहर आती हैं और आ भी जाएं तो किसी ना किसी को कुछ काम करते देख टोक देती हैं और बिन बताए सुबह अख़बार भी उठा ले जाती हैं जो शाम तक पढ़ना नसीब नहीं होता। ख़ैर, उनसे बात करना कॉलोनी में किसी को ख़ास पसंद नहीं। उन दिनों टीवी चैनल कोरोना वायरस का ठीकरा तबलीगी जमात के मुसलमानों पर मढ़ रहे थे। ट्विटर, फेसबुक, और तमाम डिजिटल प्लेटफार्म मुसलमानों को फ़ल, सब्ज़ियों और बर्तनों पर थूकते हुए दिखा रहे थे। एक सुबह जब सब्ज़ी वाला अपनी रेहड़ी लेकर कॉलोनी आया तो मानो लाइन लग गई। मैं भी मास्क लगाए, खुद थैला पकड़े, रेहड़ी के चक्कर लगा रही थी और लोगों से दूरी बना रही थी। तभी पड़ोसी आंटी भी मेरे से एक मीटर की दूरी पर सब्ज़ी लेने लगी। मोल-भाव चल रहा था और लोगों की भीड़ भी लग रही थी। बगल ...