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Showing posts from May, 2015

बारिश

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मौसम पर आज बेशुमार प्यार आया , जब बादलों ने गरज कर दिखाया , बालकनी से देखा तो दिल मुस्कुराया , आग सी गर्मी में , जब ठंडी हवा का झोंका आया ! वो बादल की गड - गड , वो बारिश की छम - छम , वो हवा की सर - सर , वो बिजली का कड़कना , एक अहसास नया सा आया ! इस नयेपन में , कुछ अलग है कुछ ख़ास है , खूबसूरत ख़्वाब हैं , आगे बढ़ने की आस है ! जीवन के हर मोड़ पर , कभी जीत है , कभी हार है , हर पल को जीना ही तो , ज़िन्दगी का सार है !

एक दोस्त

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आज बात करने को जी चाहा , तो सोचा खुद से बतिया लिया जाये , मन जो भारी सा है , हल्का किया जाये , कभी रोई , कभी हंसी , पर बातें चलती रहीं , मन हल्का हुआ और शांत भी , फिर सोचा .. ये कोशिश अब अक्सर की जाये , आज वक़्त कहाँ है किसी के पास , खुद में दोस्त को तलाश लिया जाये , ये समझता भी है , समझाता भी , हर मुसीबत में साहस बढ़ाता भी , मासूम सा है और चंचल भी , मुझमें आत्मविश्वास जगाता भी , मुझ में ही तो है तू , पर दिखता नहीं सामने , आवाज़ देता है अंदर से , सोचा कुछ गुनगुना लिया जाये , ज़िन्दगी की भागती कश्मकश में , अब आसान लगता है जीना , दोस्त जो मिला खुद में ....... ‘ खुद को’ खुद में जी लिया जाये !

आज़ाद पतंग

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आज़ादी .... विचारों की , सोच की , कुछ करने की , ..... किसे अच्छी नहीं लगती , रंगों से सजी महफ़िल ... किसे सुन्दर नहीं लगती , अपनों का साथ होना .... किसे सुकून नहीं देता , अगर ऐसा है तो क्यों आया ये बदलाव है ? कहीं रिश्तों में तक़रार है , कहीं रंग का भेदभाव है , आज इंसान एक दूजे का दुश्मन है , हर तरफ प्यार का अभाव है , कोई पास होकर भी दूर है , कोई जानकर भी अनजान है , लेकिन आसमान में उड़ती ये पतंगे .... शायद कुछ याद दिलाती हैं , डोलती हैं ... डगमगाती हैं .... उलझती हैं ... फिर सुलझ जाती हैं , भिन भिन रंगों की हैं ... आकार भी हैं छोटे बड़े , लेकिन जब उड़ान हवा में भर्ती हैं ... तो एक परिवार हो जाती हैं , सूरज की किरणों से टकराती है , तेज़ हवा संग बह जाती है , पर आशा और उम्मीद लिए फिर पंख फैलाती है , समझ सको तो बहुत कुछ सिखलाती हैं , अपने दायरों में रह कर भी ऊंचाइयों को छू जाती हैं , ज़रा संभलें हम भी , समझें और विचार क...

दिल-ए-दास्तां

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सोच सोच कर थकना भी ज़रूरी है , ऐसा सोचूंगी , कभी सोचा ना था , स्कूल से कॉलेज , कॉलेज से यूनिवर्सिटी , यूनिवर्सिटी से नौकरी , और अब फिर से पढाई , आधी ज़िन्दगी सोच में ही कट गयी , अब सोचती हूँ आगे ज़िन्दगी कैसी होगी , जो करना था , क्या कर रही हूँ ? जो पाना था , क्या पा लिया है ? मन विचलित सा होता है जब भी ये सोचती हूँ , शायद कुछ अधूरा रह गया , कुछ पीछे छूट गया , कुछ ख्वाहिशें थी , जिन्हें पंख नहीं दिए , कुछ सपने थे , जिन्हें अधूरा छोड़ दिया , अब सोचती हूँ तो लगता है वक़्त निकल गया , थोड़ा गहराई में सोचूं तो अहसास होता है , शायद खुद के बारे में सोचना गुनाह नहीं है , ज़िन्दगी में इस बात का मलाल रहेगा , पर शिकायत अब करूँ भी तो किस से ? और कब तक ? बीता समय लौट नहीं आएगा .. वो कल था , बीता हुआ कल ही रहेगा , इस सोच में उम्मीद अब ' आज ' है जो शायद आने वाले कल को सँवार दे , दुनिया भी चल रही है , तो हम भी चल दिए , लेकिन...