दिल-ए-दास्तां

सोच सोच कर थकना भी ज़रूरी है,
ऐसा सोचूंगी, कभी सोचा ना था,
स्कूल से कॉलेज, कॉलेज से यूनिवर्सिटी,
यूनिवर्सिटी से नौकरी, और अब फिर से पढाई,
आधी ज़िन्दगी सोच में ही कट गयी,
अब सोचती हूँ आगे ज़िन्दगी कैसी होगी,
जो करना था, क्या कर रही हूँ?
जो पाना था, क्या पा लिया है?
मन विचलित सा होता है जब भी ये सोचती हूँ,
शायद कुछ अधूरा रह गया, कुछ पीछे छूट गया,
कुछ ख्वाहिशें थी, जिन्हें पंख नहीं दिए,
कुछ सपने थे, जिन्हें अधूरा छोड़ दिया,
अब सोचती हूँ तो लगता है वक़्त निकल गया,
थोड़ा गहराई में सोचूं तो अहसास होता है,
शायद खुद के बारे में सोचना गुनाह नहीं है,
ज़िन्दगी में इस बात का मलाल रहेगा,
पर शिकायत अब करूँ भी तो किस से? और कब तक?
बीता समय लौट नहीं आएगा.. वो कल था, बीता हुआ कल ही रहेगा,
इस सोच में उम्मीद अब 'आज' है जो शायद आने वाले कल को सँवार दे,
दुनिया भी चल रही है, तो हम भी चल दिए,
लेकिन गहरे घाव इतनी जल्दी कहाँ पीछा छोड़ते हैं,
अब सोचती हूँ की सोच की इस दौड़ में अब थक सी गयी हूँ,
ये थकना अच्छा है, सुकून दे रहा है,
दिल मुस्कुराता है .... फिर सोचती हूँ,
दिल को बहलाने के लिए 'ग़ालिब', ये ख़्याल भी अच्छा है...


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