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Showing posts from October, 2015

वो गुज़रा ज़माना

पार्क खेल का ठिकाना था , दिल बारिश का दिवाना था ! नींद वक़्त से आती थी , बुज़ुर्गों की कहानियाँ जो सुलाती थी ! ना फिक्र थी किसी चीज़ की , हर मौसम लगता सुहाना था ! बात ये बीते कल की है , जो गुज़रा ज़माना था ! वही असली खज़ाना था , जो   बचपन का फ़साना था !

दिल लगी

मैं हासिल कर लूँ दुनिया जहां , तू ज़रिया तो बन , मैं झूमूँ सरगम की तरह , तू साज़ तो बन , हर मुश्किल हो जाएगी आसां , तू अंजाम तो बन , हर शक़्स से लड़ जाऊं मैं , तू आवाज़ तो बन , ये ज़िन्दगी बन जाये गुलिस्तां , तू अहसास तो बन !

तेरे मेरे दरमियां

ना रह सके जो साथ हमेशा , यादों में रहना तुम , ख्यालों में कहना तुम , कुछ तो रखना वास्ता , चाहे फिर हो फ़ासला , तेरे मेरे दरमियां , कोई बने दास्तां , तेरे मेरे दरमियां ..

चलना ही अपना काम है

बदलाव की एक चाह में , जो लहर सी है उठ रही , उस उम्मीद की डगर पर , चलना ही अपना काम है ! ग़र बदल सके उस सोच को , जो मुल्क़ को खोखला कर रही , हौंसला और हिम्मत , ऐसे रख , चलना ही अपना काम है ! ना सोच अब बदलाव लाने आएगा कोई और , वो तू ही है जो थामेगा , इस देश की बागडोर ! लाख खामियां तो होंगी ज़रूर तूने देखीं , एक कदम तो बढ़ा , तो सुधार की ओर ! हाथों में संजोये है , इस देश की तकदीर को , एक वोट तेरी बदल सकती है , देश की तस्वीर को ! बदलाव समय है मांगता , नहीं ये बात घड़ियों की , मन में ठान ले जो ग़र , तू वक़्त का रुख मोड़ दे ! तू हिम्मत तो रख , बदलाव की , नई सोच से अलगाव की , बूँद - बूँद से सागर है भरता , इस सोच से नव - निर्माण की ! बदलाव की एक चाह में , जो लहर सी है उठ रही , उस उम्मीद की डगर पर , चलना ही अपना काम है !

सब रावण तो राम कौन?

ये कैसी विडंबना है कलयुग की , रावण तो जलता है हर साल , पर बुराई नहीं मरती हर साल , जो सदियों पहले कथाओं में , श्री राम ने रावण को हराया था , सत्य का परचम लहराया था , रामायण का इतिहास बनाया था , हारा रावण नहीं , बुराई थी , जीते राम नहीं , अच्छाई थी , कलयुग की रामायण कुछ और है , जलता है पुतला , पर बुराई नहीं जलती , झूठ की दुनिया में , सच्चाई नहीं टिकती , हर कोई मनाता है त्योहार की खुशियाँ , सच को मानना पर लगता मुश्किल , ये विडंबना ही तो है कलयुग की , कहने को त्यौहार बड़ा , मन में सबके रावण बसा , अहंकार में चूर हर कोई , मोह बंधन से परे ना कोई , झाँक ले जो मन में एक बार , करके बुराइयों का परित्याग , जीत ले हर सच की लड़ाई , दशहरा है उसी का , दिवाली भी उसी की ..!!

हंगामा जो ये बरपा

खाने खिलाने की बात पर , हंगामा जो ये बरपा , कुछ रूठ गए हमसे , वो छूट गए जिनके , कुछ ने मोर्चा है पकड़ा ! धर्म के नाम पर , ये कैसी चल रही सियासत , भेदभाव की छोटी सोच ने , है इंसानियत को जकड़ा !

कुछ ना कहो

कुछ कहो ना तुम , लफ़्ज़ों से आज , ख़ामोशी तुम्हारी , मुझसे कह रही है , हर लफ्ज़ में इसके , राज़ है कितने दफ़न , मेरी आँखें उनको , रह रह के टटोल रही हैं , समझ गयी मैं , जो कहना था तुमको , संग मेरे , ना रहना है तुमको , हम भी खामोश हैं , दूर तुम जाओगे चाहे , तेरी ख़ामोशी में भी , साथ तेरा निभाएंगे , हम दूर तलक , तेरे ही नग्में गाएंगे , समझ सके तो समझ लेना , ख़ामोश रहकर ही , हम अपनी दास्ताँ सुनाएंगे ..