जुस्तजू ये कैसी
तुम्हें पाने
की जुस्तजू में,
डर है
की कहीं
पाकर तुम्हें,
महकते अहसास
को खो
ना दूँ,
कहीं रोज़
मिलने की
चाहत को,
कुछ महीनो
में पिरो
ना दूँ,
कश्मकश ये
कैसी हर
वक़्त,
सता रही
यूँ मुझको,
कहीं हाँ-ना के
सिलसिलों में,
बेवज़ह दिल
की क़सक
को पनाह
ना दूँ..
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