आज़ाद पतंग
रंगों से सजी
महफ़िल ...किसे सुन्दर
नहीं लगती,
अपनों का साथ
होना ....किसे सुकून
नहीं देता,
अगर ऐसा है
तो क्यों आया
ये बदलाव है?
कहीं रिश्तों में तक़रार
है, कहीं रंग
का भेदभाव है,
आज इंसान एक दूजे
का दुश्मन है,
हर तरफ प्यार
का अभाव है,
कोई पास होकर
भी दूर है,
कोई जानकर भी अनजान
है,
लेकिन आसमान में उड़ती
ये पतंगे.... शायद
कुछ याद दिलाती
हैं,
डोलती हैं...डगमगाती हैं....
उलझती हैं...फिर
सुलझ जाती हैं,
भिन भिन रंगों
की हैं... आकार
भी हैं छोटे
बड़े,
लेकिन जब उड़ान
हवा में भर्ती
हैं... तो एक
परिवार हो जाती
हैं,
सूरज की किरणों
से टकराती है,
तेज़ हवा संग
बह जाती है,
पर आशा और
उम्मीद लिए फिर
पंख फैलाती है,
समझ सको तो
बहुत कुछ सिखलाती
हैं,
अपने दायरों में रह
कर भी ऊंचाइयों
को छू जाती
हैं,
ज़रा संभलें हम भी,
समझें और विचार
करें,
नफरतों को छोड़,
प्यार, एकता का
संचार करें,
भाईचारा
हो, समन्वय हो,
एक दूजे का
सम्मान करें,
सब बातों से ऊपर
उठकर, 'इंसानियत के मज़हब'
का विस्तार करें
!

Bful poem..keep up the gud work!
ReplyDeletethank you Deepika :)
DeleteBeautifully written!
ReplyDeleteThank you so much Rachna :)
DeleteVery inspirational poem... Keep inspiring people through your pen... Best of luck...
ReplyDeleteThank you Robin :)
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