दुनिया एक, बंटवारे अनेक !
धरती
आसमाँ यूँ
जहां का
हिस्सा हैं,
जीवन
में इनके
कितना बंटवारा है,
आसमां
में उड़ते
पंक्षियों में,
ना
जात की
लड़ाई है,
ना
मज़हब कोई
मुद्दा है,
ना
भेदभाव रंगों
का है,
ना
रंज दुश्मनी का
है,
परिंदों की
इस दुनिया में,
प्यार
और भाईचारा है,
एक
होने का
नारा है,
एक
दुनिया धरती
की है,
रहते
हम सब
जहाँ,
एक
दूजे को
देखना,
पर
हमें कहाँ
गवारा है,
रिश्तों की
दुहाई हम
देते,
यहाँ
अपनों ने
अपनों को
मारा है,
इंसान
तो बन
गया तू,
इंसानियत के
तराजू पे
तू हारा
है,
धरती
आसमाँ यूँ
जहां का
हिस्सा हैं,
जीवन
में इनके
कितना बंटवारा है..!!
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