ये कैसी मसरूफ़ियत..
इंसान
की मसरूफ़ियत तो
देखो,
खुद
से ही
इसको फ़ुरसत
नहीं है
!
यूँ
तो हर
दिन दौड़
रहा है,
कदम
मिलाके दुनिया के
संग,
सामने
वाले की
पर इसको,
कोई
खैर ख़बर
नहीं है
!
जाने
का कोई
वक़्त नहीं
है,
आने
पर कोई
होश नहीं
है,
करूँ
शिक़ायत कैसे,
और किसको,
सुनने
की फ़ुरसत
भी तो
नहीं है
!
ये
कैसी मसरूफ़ियत ना
जाने,
ज़िन्दगी मानो
थम सी
गयी है,
सब
रंग हों,
तो सजती
है महफ़िल,
पर
दुनिया खुद
में रम
सी गयी
है !
इंसान
की मसरूफ़ियत तो
देखो,
खुद
से ही
इसको फ़ुरसत
नहीं है
!
Nice poem. Keep it up! :)
ReplyDeleteThank you deepika :)
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