ये कैसी मसरूफ़ियत..

इंसान की मसरूफ़ियत तो देखो,
खुद से ही इसको फ़ुरसत नहीं है !

यूँ तो हर दिन दौड़ रहा है,
कदम मिलाके दुनिया के संग,
सामने वाले की पर इसको,
कोई खैर ख़बर नहीं है !

जाने का कोई वक़्त नहीं है,
आने पर कोई होश नहीं है,
करूँ शिक़ायत कैसे, और किसको,
सुनने की फ़ुरसत भी तो नहीं है !

ये कैसी मसरूफ़ियत ना जाने,
ज़िन्दगी मानो थम सी गयी है,
सब रंग हों, तो सजती है महफ़िल,
पर दुनिया खुद में रम सी गयी है !

इंसान की मसरूफ़ियत तो देखो,
खुद से ही इसको फ़ुरसत नहीं है !

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