भीड़ में गुम इंसान
वो
दौड़ता है
रोज़,
मंज़िल
की ओर,
ढूंढने अपना
रास्ता,
फिर
भीड़ में
खोकर..
फिर
होता है
निराश,
नाकामी पर
अपनी,
खोजता
है खुदको,
फिर
भीड़ में
खोकर..
उम्मीद फिर
बनती है,
सपने
फिर सजते
हैं,
नयी
राह पकड़ता
है,
फिर
भीड़ में
खोकर..
उलझनों के
जाल में,
भीड़
के जंजाल
में,
फंस
गया है
इंसान ऐसे,
बंद
पिंजरे में
पंक्षी जैसे..
हर
कोई आज..
इस दौड़
का हिस्सा है,
कभी
ना ख़त्म
हो...ये
वो किस्सा है
!
truth of today's life...Everyone is running a race which seems to lead nowhere..nice words..
ReplyDeleteI completely agree. Thanks deepika :)
ReplyDeletebahut khoob :-)
ReplyDeleteThank you so much Deepak bhai :)
DeleteWaa ji waa
ReplyDeleteThanks Jiju :)
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