दिल का रिश्ता

दिल से दिल का रिश्ता,
वो कहते थे रूह का है,
फिर क्यों आज ये,
चंद शब्दों का मोहताज है..












 कभी ना थे जो दूर,
वो पास आने से कतराते हैं,
खाई थी जो संग कसमें,
उससे तोड़कर जाते हैं..

अपने थे, आज अनजान हैं,
मजबूर से नज़र आते हैं,
गीले शिकवों में इस डोरी के मोती,
अब बिखरे नज़र आते हैं..

ये कैसी शर्तें हैं, कैसा रिश्ता है,
ना साथ है, ना प्यार है,
बदलते ज़माने संग जो बदले,
वो प्यार नहीं व्यापार है..

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